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उत्तरायणी कौतिक को सांस्कृतिक पहचान बनाने का संकल्प

बैठक के दौरान विभिन्न विषयों पर चर्चा

उत्तरायणी कौतिक महोत्सव के आयोजन को भव्य, प्रभावी और सांस्कृतिक दृष्टि से यादगार बनाने के उद्देश्य से विधानसभा सचिवालय के आपदा सभागार प्रांगण में आयोजन समिति की एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई।

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बैठक में उत्तराखंड की लोक-संस्कृति, परंपराओं, युवाओं की भागीदारी, आर्थिक प्रबंधन और प्रचार-प्रसार को लेकर गहन विचार-विमर्श हुआ। उपस्थित सभी व्यक्तियों ने अपने-अपने अनुभव साझा किए और महोत्सव को भव्य रूप देने का संकल्प दोहराया।

 

बैठक की अध्यक्षता ललित जोशी ने की, जबकि संचालन बलदेव चंद्र भट्ट ने किया। इस दौरान डॉ. भट्ट ने कहा कि सभी सहयोगी अपने नाते-रिश्तेदारों और मित्रों को इस महोत्सव से जोड़ें तथा इसकी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को सुदृढ़ बनाए रखें। उन्होंने सभी सदस्यों से समय-समय पर अपने रचनात्मक और व्यावहारिक सुझाव साझा करने का आह्वान किया।

 

करम राम ने इसे एक ऐतिहासिक प्रयास बताते हुए कहा कि प्रारंभिक चरण में चुनौतियाँ स्वाभाविक हैं, लेकिन सभी को अपने-अपने रीति-रिवाजों और परंपराओं को मंच पर लाने का अवसर मिलेगा। उन्होंने प्रचार-प्रसार को मजबूत करने, वित्तीय व्यवस्था को पहले सुदृढ़ करने तथा उच्च स्तर से निर्देशों के प्रभावी अनुपालन पर जोर दिया।

 

भरत सिंह बिष्ट ने लखनऊ में आयोजित भव्य आयोजनों के अनुभव साझा करते हुए अलग-अलग समितियों के गठन और संगठित फंड संग्रह की आवश्यकता बताई। उन्होंने साहित्यिक प्रतियोगिताओं, “मेरो गांव मेरो पहिचान” जैसे कार्यक्रमों और बाल कलाकारों को मंच देने का सुझाव दिया। साथ ही प्रिंट मीडिया और सोशल मीडिया के व्यापक उपयोग पर बल दिया।

 

आर्य मैडम ने कहा कि महोत्सव का मूल केंद्र संस्कृति होनी चाहिए और पारंपरिक झांकियों के माध्यम से गांवों की लोकधारा को सामने लाया जाए। टिहरी से आए वरिष्ठ नागरिकों ने आयोजन के लिए शुभकामनाएं देते हुए हरसंभव सहयोग का आश्वासन दिया।

 

पूरन जोशी ने कुमाऊं और गढ़वाल के पारंपरिक खान-पान पर आधारित प्रतियोगिताओं के आयोजन का सुझाव दिया, जबकि मुख्यमंत्री कार्यालय से जुड़े कृष्णा जी ने युवाओं और उनके बैंड्स को जोड़ने तथा सोशल मीडिया के माध्यम से संदेश को व्यापक बनाने पर जोर दिया।

 

विमल पांडे ने हर जिले की पारंपरिक हथकरघा और स्थानीय उद्योगों को महोत्सव में सम्मिलित करने की बात कही। लीला पांडेय ने उत्साहपूर्वक सहयोग का भरोसा दिलाते हुए घुघुत की माला बनाने और कार्यक्रम की शुरुआत स्थानीय बोली-भाषाओं से करने का सुझाव दिया, ताकि बच्चे अपनी जड़ों से जुड़े रहें।

 

हंसा धामी ने चार दिनों तक चार प्रमुख कलाकारों को मंच देने और पहाड़ी व्यंजनों को विशेष रूप से प्रोत्साहित करने की बात कही। कलाकार नेगी ने कहा कि यह अवसर उन प्रतिभाओं को आगे लाने का है जिन्हें मंच की आवश्यकता है।

 

भुवन तिवारी ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि पहाड़ की वास्तविक पहचान वहां की जीवनशैली, परिधान, पारंपरिक व्यंजन, जड़ी-बूटियां, संजीवनी और स्थानीय उत्पादों में निहित है। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि उत्तरायणी कौतिक महोत्सव के माध्यम से पहाड़ के इन सभी विशिष्ट उत्पादों को एक मंच पर प्रभावी रूप से प्रदर्शित किया जाना चाहिए।

 

इसके लिए गढ़वाली, कुमाऊनी और जौनसारी समाज के लोगों को मुख्य रूप से जोड़ते हुए उनकी समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर, लोकजीवन और परंपराओं को व्यापक स्तर पर शोकेस करना आवश्यक है, ताकि नई पीढ़ी अपनी जड़ों से जुड़ सके और बाहरी दुनिया को भी उत्तराखंड की सांस्कृतिक विविधता का परिचय मिल सके। भुवन तिवारी और बलदेव भट्ट ने सामूहिक रूप से इस लोकपर्व को भव्य बनाने का संकल्प दोहराया।

 

गंगा गिरी गोस्वामी ने महोत्सव के माध्यम से समाज में नशामुक्ति का संदेश देने और युवा पीढ़ी को नशे से दूर रखने का आह्वान किया। बैठक में यह भी निर्णय लिया गया कि उत्तरायणी कौतिक महोत्सव को सुव्यवस्थित एवं सफल बनाने के लिए मेले में लगने वाले स्टॉल, सांस्कृतिक कलाकारों की सहभागिता, खान–पान की व्यवस्था, अतिथियों के स्वागत, प्रचार-प्रसार तथा समस्त व्यवस्थाओं की जिम्मेदारियाँ अलग-अलग समितियों के माध्यम से सुनिश्चित की जाएंगी।

 

आयोजन से जुड़ी प्रत्येक जिम्मेदारी स्पष्ट रूप से तय कर कार्य विभाजन किया जाएगा, ताकि महोत्सव सुचारु, अनुशासित और जनसहभागिता से परिपूर्ण रूप में आयोजित हो सके। बैठक के समापन पर उपस्थित सभी सदस्यों ने सर्वसम्मति से यह संकल्प लिया कि इस वर्ष उत्तरायणी कौतिक महोत्सव को देहरादून की प्रमुख सांस्कृतिक पहचान के रूप में स्थापित किया जाएगा और इसे लोक-संस्कृति, एकता और सामाजिक चेतना का सशक्त मंच बनाया जाएगा।

 

इस अवसर पर गीता राम गौढ़, राज्य मंत्री, भुवन तिवारी, गणेश कांडपाल, हंस धामी, लीला पांडेय, विश्वनाथ, पूरन चंद जोशी, सुंदर सिंह भंडारी, मीरा आर्य, मंगल सिंह रावत, भरत सिंह बिष्ट, कुंदन चौहान, करम राम, रवि परगई सहित अनेक सामाजिक, सांस्कृतिक और बौद्धिक व्यक्तित्व उपस्थित थे।

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