पिथौरागढ़ : चमकदार नहीं, सरल पुस्तकें ही बनाती हैं समझदार पीढ़ियाँ : डा. पंत
रंगीन किताबें, कम होती पठन क्षमता

भारतीय शिक्षा प्रणाली इस समय एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहाँ ज्ञान की सादगी और सीखने की सहजता चमक-दमक और बाज़ारवाद की भीड़ में धीरे-धीरे खोती जा रही है। स्कूलों की किताबें आज शिक्षा का माध्यम कम और दृश्य आकर्षण का उत्पाद अधिक बन गई हैं।

रंगों, डिजाइनों और चमकीलापन का ऐसा दबाव है कि शिक्षण सामग्री का असली उद्देश्य, सोच, समझ और पठन कौशल विकसित करना गौण होता जा रहा है। प्रकाशकों और बाजार का यह मानना कि किताब जितनी रंगीन होगी, उतनी आधुनिक होगी। बाल मनोविज्ञान के बिल्कुल उलट है। हाल ही में 06 से 12 वर्ष के बच्चों पर किए गए परीक्षण में पाया गया कि साधारण सफेद पन्नों पर लिखी सरल सामग्री को बच्चे अधिक गति और स्पष्टता से पढ़ते हैं।
जबकि अत्यधिक रंगीन पृष्ठभूमि, चमकीले चित्र, घनी डिजाइन और असंगत टाइपोग्राफी बच्चों का ध्यान भटकाते हैं, पठन क्षमता घटाते हैं और कई बार शब्दों व पंक्तियों को समझने में भ्रम पैदा करते हैं। इसका सीधा वैज्ञानिक कारण है बच्चों का विकसित होता मस्तिष्क दृश्य उत्तेजनाओं की अधिकता को संभाल नहीं पाता। रंगों की भरमार उनके दिमाग को थका देती है। बच्चा शब्दों की बजाय पहले चित्रों पर ध्यान देता है और जब चित्र अधिक और शब्द कम हों तो शब्द पीछे छूट जाते हैं, सीखने की प्रक्रिया टूट जाती है।
पढ़ाई आनंद से तनाव में बदल जाती है। यह समस्या केवल डिज़ाइन की नहीं, बल्कि शिक्षा के बाज़ारीकरण का परिणाम है। कई स्कूल भी अभिभावकों के दबाव में महंगी, आकर्षक किताबें अपनाने को मजबूर हैं क्योंकि अभिभावक इन्हें ही अच्छी शिक्षा का संकेत मान लेते हैं। जबकि सच्चाई यह है कि सीखने की गुणवत्ता सरलता से बढ़ती है, दिखावे से नहीं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 स्पष्ट रूप से बताती है कि प्रारम्भिक शिक्षा का लक्ष्य होना चाहिए, तनाव रहित, वैज्ञानिक, उम्रानुकूल और सरल सीखने का वातावरण।
जब पुस्तकें ही बच्चे के सीखने को जटिल कर दें, तो नीति का आधार कमजोर हो जाता है। नीति जिस मूलभूत पठन क्षमता को शिक्षा की नींव मानती है, वही इन दिखावटी किताबों के कारण प्रभावित हो रही है। इसलिए अब आवश्यकता है कि सरकार, प्रकाशन संस्थान, स्कूल और शैक्षिक संगठन मिलकर एक वैज्ञानिक मानक तैयार करें, जिसमें बच्चों की पुस्तकों का डिज़ाइन मनोवैज्ञानिक और शैक्षिक जरूरतों के अनुरूप हो। किताबों की सादगी को पिछड़ापन नहीं बल्कि विज्ञान और शिक्षा के अनुरूप प्राथमिकता के रूप में स्वीकार करना होगा।
अभिभावकों को भी यह समझना होगा कि महंगी, रंगीन पुस्तकें नहीं, बल्कि सहज पढ़ी जाने वाली पुस्तकें ही वास्तविक शिक्षा का आधार हैं। जिस किताब से बच्चा तेज़ी से पढ़ सके, समझ सके और पढ़ने में आनंद महसूस करे वही उसकी सही किताब है। आज यह सवाल सिर्फ किताबों का नहीं, आने वाली पीढ़ियों की बौद्धिक क्षमता का भी है।
हमें ऐसी किताबें चाहिए जो दिमाग को भटकाएँ नहीं, सोच को दिशा दें। किताबों से चकाचौंध हटानी होगी, ताकि सीखने की रोशनी और स्पष्टता बच्चों के मन में सुरक्षित रह सके। सीखने का सत्य स्पष्ट हैकृज्ञान की जड़ें सादगी में मजबूत होती हैं, चमक में नहीं। जितनी जल्दी इस सच्चाई को हम शिक्षा प्रणाली में लागू करेंगे उतना ही सुरक्षित और सार्थक अपने बच्चों का भविष्य बना पाएँगे। लेखक डॉ. किशोर कुमार पंत, अध्यक्ष-एसोसिएशन ऑफ प्राइवेट स्कूल्स कमेटी, पिथौरागढ़ (उत्तराखंड)।
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