पिथौरागढ़ : सामाजिक बदलाव और बदलते बचपन पर मंथन
तकनीक व संवादहीनता को बताया बड़ी चुनौती, सेमीनार का आयोजन

पिथौरागढ़ में अभिलाषा समिति द्वारा आयोजित सेमिनार सामाजिक बदलाव एवं बदलता बचपन एक गंभीर विहंगावलोकन में समकालीन समाज में बदलते बचपन, तकनीकी प्रभाव और सामाजिक चुनौतियों पर गंभीर चर्चा हुई। कार्यक्रम में शिक्षाविदों, समाजसेवियों, विधि विशेषज्ञों और अभिभावकों ने भाग लेकर बाल-मन की वर्तमान स्थिति पर अपने विचार रखे।

मुख्य वक्ता डॉ. अशोक कुमार पंत (चेयरमैन, मानस ग्रुप ऑफ कॉलेज) ने कहा कि तकनीक स्वयं समस्या नहीं है, बल्कि उसका असंतुलित उपयोग बच्चों के भावनात्मक संतुलन को प्रभावित कर रहा है। उन्होंने परिवारों में संवाद की कमी को गंभीर चिंता बताया। पूर्व प्राचार्य डायट दुष्यंत पांगती ने शिक्षा को अंक-प्रतिस्पर्धा से ऊपर उठाकर व्यक्तित्व विकास से जोड़ने की आवश्यकता बताई।
वहीं राजेंद्र सिंह बिष्ट (हिमालयन ग्राम्य विकास समिति) ने ग्रामीण क्षेत्रों में डिजिटल प्रभाव के बढ़ते दुष्प्रभावों पर चिंता जताई। वरिष्ठ अधिवक्ता रघुनाथ सिंह चौहान ने साइबर अपराधों में वृद्धि की ओर संकेत करते हुए अभिभावकों को सतर्क रहने की सलाह दी। संगोष्ठी में 14 से 17 वर्ष आयु वर्ग में बढ़ती आत्महत्या प्रवृत्ति पर भी गंभीर चिंता व्यक्त की गई। वक्ताओं ने इसे सामाजिक असंतुलन, प्रतिस्पर्धा और संवादहीनता का परिणाम बताया।
डॉ. रेनू कार्की (प्रबंधक, विद्यासागर पब्लिक स्कूल, डीडीहाट) ने जीवन-कौशल शिक्षा और परामर्श व्यवस्था को सुदृढ़ करने पर बल दिया। उन्होंने शिक्षक, अभिभावक और छात्र के बीच बेहतर समन्वय को समाधान का आधार बताया। कमला चुफाल ( पूर्व नगर पालिका अध्यक्ष) ने कहा कि बचपन की सुरक्षा सामूहिक सामाजिक उत्तरदायित्व है।
लै. मोहित बिष्ट (निदेशक, दून डिफेंस एकेडमी) ने युवाओं में बढ़ती नशा प्रवृत्ति और पारिवारिक जीवन मूल्यों के क्षरण पर प्रकाश डाला। संगोष्ठी में किशोर आत्महत्याओं के बढ़ते मामलों पर विशेष चिंता व्यक्त की गई। राजेंद्र सिंह बोहरा (प्रबंधक, लिटिल एंजेल्स सीनियर सेकेंड्री स्कूल) ने 14 से 17 वर्ष आयु वर्ग में बढ़ती आत्मघाती प्रवृत्तियों के संदर्भ में कहा कि यह केवल व्यक्तिगत विफलता नहीं, बल्कि सामाजिक असंतुलन का परिणाम है।
प्रतिस्पर्धा की अंधी दौड़, तुलना की संस्कृति और संवादहीन परिवार किशोर मन को भीतर से तोड़ रहे हैं। मशीनीकृत जीवन और संवेदनहीनता। मनोज कुमार जोशी (प्रबंधक, ग्रीन वैली पब्लिक स्कूल) ने कहा कि अत्यधिक मशीनीकृत जीवन शैली बच्चों को संवेदनहीन बना रही है। गति बढ़ी है, परंतु गहराई घट रही है। बाल मनोविज्ञान की अनदेखी। विप्लव भट्ट (प्रबंधक, बटर फ्लाई स्कूल) ने बाल मनोविज्ञान की उपेक्षा को गंभीर समस्या बताया।
मनोहर कन्याल ने शिक्षा को त्रिकोणीय संतुलन, शिक्षक, अभिभावक और छात्र के रूप में परिभाषित किया। देवाशीष पंत (निदेशक, मानस ग्रुप ऑफ कॉलेज) ने चेताया कि बच्चों को सामाजिकए राजनीतिक अथवा शैक्षणिक प्रयोगों का उपकरण न बनाया जाए। बचपन संरक्षण और पोषण का विषय है, प्रयोग का नहीं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के संदर्भ में समाधान । संगोष्ठी के निष्कर्षों को राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के परिप्रेक्ष्य में भी देखा गया। नीति समग्र शिक्षा, जीवन-कौशल, नैतिक विकास और परामर्श तंत्र को प्राथमिकता देती है।
सर्वसम्मति से यह निष्कर्ष निकला किए अभिभावक संवाद की संस्कृति पुनर्जीवित करें। विद्यालयों में परामर्श एवं जीवन.कौशल शिक्षा को सुदृढ़ बनाया जाए। तकनीक का संतुलित उपयोग सुनिश्चित हो। प्रतिस्पर्धा के स्थान पर सहयोग और तुलना के स्थान पर प्रोत्साहन को बढ़ावा दिया जाए। राजनीतिक एवं सामाजिक विमर्श को मर्यादित और मूल्यपरक दिशा दी जाए।
संगोष्ठी का सार यही रहा कि बदलता समय चुनौती अवश्य है, किंतु समाधान हमारे सामूहिक विवेक में निहित है, यदि संवाद, संवेदना और संतुलन को पुनः केंद्र में स्थापित किया जाए, तो तकनीक भी सृजन का माध्यम बन सकती है। बचपन की रक्षा केवल भविष्य की सुरक्षा नहीं वर्तमान की नैतिक जिम्मेदारी है।
यदि समाज सजग, विद्यालय संवेदनशील और परिवार संवादशील बनें, तो बदलता बचपन सशक्त और संस्कारित भारत की आधारशिला सिद्ध होगा। इस अवसर पर धीरज खड़ायत, हिमांशु जोशी, गजेन्द्र बोरा, धीरज सिंह पोखरिया, बसंत बल्लभ भट्ट, संजय पंत, डॉ. अनीता जोशी, चंचल सिंह तथा विद्यालय समस्त स्टाफ आदि मौजूद रहा।
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