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बालिकाओं के स्वास्थ्य, शिक्षा और अधिकारों में निवेश से संवरेगा भविष्य : डॉ. रुचिता

अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस: बाल विवाह रोकने के साथ पोषण, योग और मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान की जरूरत

बालिकाओं को समान अधिकार, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं और जीवन से जुड़े फैसले लेने की स्वतंत्रता देना एक न्यायपूर्ण और विकसित समाज की बुनियादी जरूरत है। इसी उद्देश्य से हर साल 11 अक्टूबर को अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस मनाया जाता है। वर्ष 2026 की वैश्विक थीम बाल विवाह समाप्त करने और बालिकाओं के अधिकारों में निवेश करने पर केंद्रित है।

 

योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा विशेषज्ञ डॉ. रुचिता त्रिपाठी उपाध्याय और राष्ट्रीय आयुष मिशन, हरिद्वार के विशेषज्ञ डॉ. अवनीश कुमार उपाध्याय के अनुसार, बालिकाओं के सर्वांगीण विकास के लिए शिक्षा और सुरक्षा के साथ शारीरिक स्वास्थ्य, पोषण, स्वच्छता, मानसिक संतुलन, खेलकूद और आत्मविश्वास पर भी ध्यान देना जरूरी है। परिवार, विद्यालय और समाज के संयुक्त प्रयासों से ही बालिकाओं को स्वस्थ, सुरक्षित और आत्मनिर्भर बनाया जा सकता है।

बाल विवाह बालिकाओं के अधिकारों और भविष्य के सामने गंभीर चुनौती है। कम उम्र में विवाह होने से उनकी पढ़ाई छूटने, कम उम्र में गर्भधारण, मातृ स्वास्थ्य संबंधी जटिलताओं और घरेलू हिंसा का जोखिम बढ़ सकता है। इससे उनके सामाजिक और आर्थिक अवसर भी सीमित हो जाते हैं।

 

यूनिसेफ के अनुसार, भारत में 20 से 24 वर्ष आयु वर्ग की लगभग 23 प्रतिशत युवतियों का विवाह 18 वर्ष की आयु से पहले हुआ था। हालांकि बाल विवाह की दर में कमी आई है, लेकिन इसे पूरी तरह समाप्त करने के लिए निरंतर प्रयासों की जरूरत है। इसके लिए बालिकाओं को माध्यमिक शिक्षा पूरी करने के लिए प्रोत्साहित करना, उनकी राय को महत्व देना और बाल विवाह के दुष्परिणामों के प्रति जागरूकता बढ़ाना आवश्यक है।

किशोरावस्था शारीरिक और मानसिक विकास का महत्वपूर्ण चरण है। इस दौरान संतुलित आहार, पर्याप्त नींद और नियमित शारीरिक गतिविधि जरूरी है। आयरन की कमी से होने वाला एनीमिया किशोरियों के स्वास्थ्य और दैनिक कार्यक्षमता को प्रभावित कर सकता है।डॉ. रुचिता त्रिपाठी उपाध्याय के अनुसार, बालिकाओं के भोजन में हरी पत्तेदार सब्जियां, दालें, मौसमी फल, साबुत अनाज, दूध और अन्य पौष्टिक खाद्य पदार्थ शामिल होने चाहिए।

 

लगातार थकान, कमजोरी, चक्कर आने या असामान्य पीलापन होने पर चिकित्सकीय परामर्श लेना चाहिए। आयरन की जांच और दवाओं का उपयोग भी चिकित्सकीय सलाह के अनुसार किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि मासिक धर्म के दौरान स्वच्छता बनाए रखना और सुरक्षित मासिक धर्म स्वच्छता सामग्री का उपयोग करना जरूरी है। इस विषय पर खुलकर संवाद करने तथा इससे जुड़ी भ्रांतियों को दूर करने में परिवार, विद्यालय और स्वास्थ्यकर्मी अहम भूमिका निभा सकते हैं।

डॉ. रुचिता के अनुसार, योग और नियमित शारीरिक गतिविधियां बालिकाओं में सक्रियता, आत्मविश्वास और संतुलित दिनचर्या विकसित करने में सहायक हो सकती हैं। आयु और शारीरिक क्षमता के अनुसार ताड़ासन, वृक्षासन, तितली आसन और सरल श्वसन अभ्यास दिनचर्या में शामिल किए जा सकते हैं।

 

परीक्षा का दबाव, शारीरिक बदलावों को लेकर चिंता और सामाजिक अपेक्षाएं किशोरियों में तनाव का कारण बन सकती हैं। ऐसे में उनकी बात सुनना, भावनाओं का सम्मान करना और जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ की सहायता लेना जरूरी है। योग को स्वस्थ जीवनशैली का हिस्सा मानना चाहिए, न कि चिकित्सकीय परामर्श के विकल्प के रूप में।

राष्ट्रीय आयुष मिशन, हरिद्वार के विशेषज्ञ डॉ. अवनीश कुमार उपाध्याय के अनुसार, बालिकाओं के सशक्तीकरण का अर्थ केवल उन्हें शिक्षा उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि अपनी क्षमताओं को पहचानने, अधिकारों को समझने और भविष्य के बारे में निर्णय लेने के अवसर देना भी है।  उन्होंने कहा कि बालिकाओं को विज्ञान, तकनीक, खेल, चिकित्सा, उद्यमिता और प्रशासन सहित सभी क्षेत्रों में आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।

 

परिवारों को बेटियों की शिक्षा, स्वास्थ्य और रुचियों को प्राथमिकता देनी चाहिए। घरेलू जिम्मेदारियों में समान भागीदारी और उपलब्धियों को प्रोत्साहन देने से उनका आत्मविश्वास बढ़ता है।  विद्यालयों और समुदायों में स्वास्थ्य जागरूकता कार्यक्रम, किशोर स्वास्थ्य पर संवाद, योग एवं खेल गतिविधियां और करियर मार्गदर्शन भी उनके विकास में महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं।

 

अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस बालिकाओं को सुरक्षित वातावरण, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, पौष्टिक आहार और बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी याद दिलाता है। बाल विवाह रोकने, लैंगिक भेदभाव समाप्त करने और समान अवसर सुनिश्चित करने के लिए परिवारों, शिक्षण संस्थानों, स्वास्थ्य विभागों और सामाजिक संगठनों को मिलकर प्रयास करने होंगे।

 

डॉ. रुचिता त्रिपाठी उपाध्याय और डॉ. अवनीश कुमार उपाध्याय के अनुसार, बालिकाओं के स्वास्थ्य, शिक्षा और अधिकारों में निवेश देश के भविष्य में निवेश है। जिस समाज में बालिकाओं को सम्मान, समान अवसर और अपनी प्रतिभा विकसित करने की स्वतंत्रता मिलती है, वही समाज स्वस्थ, समावेशी और प्रगतिशील बनता है।

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