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आयुर्वेद दिवस पर विशेष : स्वस्थ भविष्य के लिए आयुर्वेद : परंपरा से प्रमाण तक, उपचार से रोकथाम तक

जीवनशैली के बदलते स्वरूप ने बढ़ाई स्वास्थ्य की चुनौती

23 सितंबर 2026 को मनाया जा रहा 11वां आयुर्वेद दिवस इस वर्ष “Ayurveda for a Healthier Tomorrow – स्वस्थ भविष्य के लिए आयुर्वेद” की थीम के साथ मनाया जा रहा है। इस वर्ष का जोर आयुर्वेद को केवल परंपरागत चिकित्सा-पद्धति के रूप में देखने के बजाय वैज्ञानिक अनुसंधान, नवाचार, समन्वित स्वास्थ्य सेवाओं और समुदाय के स्वास्थ्य से जोड़ने पर है।

 

आयुर्वेद का मूल दर्शन केवल बीमारी होने के बाद उपचार तक सीमित नहीं है। स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा और रोगी के विकारों के शमन—दोनों को इसके मूल उद्देश्यों में रखा गया है। यही दृष्टिकोण आज की आधुनिक स्वास्थ्य-चुनौतियों, विशेषकर जीवनशैली संबंधी विकारों के संदर्भ में महत्वपूर्ण हो जाता है।

 

आज लंबे समय तक बैठकर काम करना, शारीरिक सक्रियता की कमी, अनियमित भोजन, अत्यधिक कैलोरी एवं अल्ट्रा-प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों का सेवन, अपर्याप्त नींद और लगातार मानसिक तनाव जैसी आदतें स्वास्थ्य को प्रभावित कर रही हैं। मधुमेह, मोटापा, उच्च रक्तचाप, हृदय संबंधी रोग तथा अनेक अन्य गैर-संचारी रोगों के जोखिम में जीवनशैली महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

 

इसलिए स्वास्थ्य-व्यवस्था का लक्ष्य केवल दवा देना नहीं, बल्कि व्यक्ति की आहार, दिनचर्या, नींद, व्यायाम, मानसिक स्वास्थ्य और सामाजिक व्यवहार को भी स्वास्थ्य-प्रबंधन का हिस्सा बनाना होना चाहिए। डॉ. अवनीश कुमार उपाध्याय के अनुसार “आयुर्वेद की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक यह है कि वह व्यक्ति को केवल रोग के नाम से नहीं देखता, बल्कि उसके आहार, दिनचर्या, प्रकृति, वातावरण और जीवन-पद्धति को भी स्वास्थ्य के संदर्भ में महत्व देता है।

 

आधुनिक समय में इस दृष्टिकोण को वैज्ञानिक प्रमाणों के साथ जोड़ना आवश्यक है।”CCRAS तथा आयुष मंत्रालय द्वारा पोषण, मानसिक स्वास्थ्य, हृदय स्वास्थ्य और विभिन्न रोगों में आयुर्वेद आधारित आहार एवं जीवनशैली संबंधी दिशानिर्देश और शोध संसाधन उपलब्ध कराए जा रहे हैं। आयुर्वेद में आहार को स्वास्थ्य का अत्यंत महत्वपूर्ण आधार माना गया है।

 

आधुनिक विज्ञान भी पोषण को मधुमेह, मोटापा, हृदय रोग और अन्य मेटाबॉलिक समस्याओं की रोकथाम के प्रमुख घटकों में मानता है।इसका अर्थ किसी एक “चमत्कारी भोजन” या किसी एक औषधि को सभी रोगों का समाधान मानना नहीं है। संतुलित, विविधतापूर्ण और व्यक्ति की आवश्यकता के अनुरूप भोजन अधिक महत्वपूर्ण है।

 

अनाज, दालें, सब्जियां, फल, पर्याप्त प्रोटीन, स्वस्थ वसा और उचित मात्रा में पानी—इनका संतुलित सेवन व्यक्ति की आयु, शारीरिक गतिविधि और स्वास्थ्य स्थिति के अनुसार होना चाहिए। आयुष की प्रकाशित जीवनशैली संबंधी दिशानिर्देशों में नियमित शारीरिक गतिविधि, योग, प्राणायाम, पर्याप्त रात्रिकालीन नींद तथा संतुलित आहार जैसे उपायों पर जोर दिया गया है।

 

डॉ. रुचिता त्रिपाठी उपाध्याय : “स्वस्थ जीवन केवल यह तय करने से नहीं बनता कि हम क्या खाते हैं। यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि हम कब खाते हैं, कितनी शारीरिक सक्रियता रखते हैं, हमारी नींद कैसी है और तनाव को किस प्रकार नियंत्रित करते हैं। योग, श्वास-अभ्यास, ध्यान और नियमित दिनचर्या व्यक्ति को स्वास्थ्य के प्रति अनुशासित बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।”

 

उच्च रक्तचाप, मधुमेह, मोटापा और असामान्य लिपिड प्रोफाइल जैसी स्थितियां लंबे समय में हृदय और रक्तवाहिनी स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकती हैं। ऐसे में केवल रक्तचाप या रक्त शर्करा की रिपोर्ट को नियंत्रित करना ही पर्याप्त नहीं है। व्यक्ति के वजन, कमर की परिधि, आहार, शारीरिक गतिविधि, नींद, तनाव, तंबाकू एवं शराब के सेवन जैसे जोखिम कारकों को भी संबोधित करना आवश्यक है।

 

आयुर्वेद की आहार-विहार आधारित अवधारणाओं का उपयोग आधुनिक चिकित्सा की आवश्यक जांच एवं उपचार व्यवस्था के साथ समन्वित और प्रमाण-आधारित तरीके से किया जा सकता है। आयुष अनुसंधान पोर्टल पर आयुर्वेद के हजारों शोध रिकॉर्ड उपलब्ध हैं और इन्हें evidence-based practice के संदर्भ में व्यवस्थित किया जा रहा है।

 

आज स्वास्थ्य सेवा की जटिल आवश्यकताओं को देखते हुए अलग-अलग चिकित्सा प्रणालियों की उपयोगी क्षमताओं को वैज्ञानिक प्रमाण, सुरक्षा और उचित रेफरल व्यवस्था के साथ जोड़ना महत्वपूर्ण है। इसका अर्थ यह नहीं है कि प्रत्येक रोग में हर चिकित्सा पद्धति समान रूप से प्रभावी सिद्ध हो चुकी है। आयुर्वेदिक औषधियों और उपचारों के संबंध में रोग-विशेष, औषधि-विशेष और उपलब्ध वैज्ञानिक प्रमाण को ध्यान में रखना आवश्यक है। कुछ क्षेत्रों में प्रमाण सीमित भी हैं और बेहतर गुणवत्ता वाले क्लिनिकल ट्रायल की आवश्यकता बनी हुई है।

 

योग को केवल शारीरिक व्यायाम के रूप में देखने के बजाय शारीरिक सक्रियता, श्वास-नियमन, विश्राम और मानसिक स्वास्थ्य के व्यापक संदर्भ में देखा जा सकता है। डॉ. रुचिता त्रिपाठी उपाध्याय के अनुसार “योग का उद्देश्य केवल कठिन आसन करना नहीं है। व्यक्ति की क्षमता के अनुरूप सरल आसन, प्राणायाम, ध्यान और विश्राम को नियमित दिनचर्या का हिस्सा बनाना अधिक महत्वपूर्ण है।

 

विशेषकर लंबे समय तक बैठे रहने वाले लोगों के लिए सुरक्षित और नियमित शारीरिक सक्रियता बहुत उपयोगी है।” हालांकि किसी गंभीर बीमारी, चोट या विशेष शारीरिक सीमा वाले व्यक्ति को योग का कार्यक्रम उसकी क्षमता और चिकित्सकीय स्थिति के अनुरूप ही अपनाना चाहिए। आयुर्वेद का भविष्य केवल अपनी प्राचीनता बताने में नहीं, बल्कि यह प्रमाणित करने में है कि उसके कौन से सिद्धांत और उपचार किस रोग में, किस व्यक्ति में, किस मात्रा में और किस परिस्थिति में प्रभावी एवं सुरक्षित हैं।

 

डॉ. अवनीश कुमार उपाध्याय : “स्वास्थ्य व्यवस्था की सफलता केवल इस बात से नहीं मापी जानी चाहिए कि अस्पताल में कितने मरीजों का उपचार हुआ। वास्तविक सफलता तब होगी जब समाज में ऐसे वातावरण और जीवनशैली का निर्माण हो, जिससे बीमारी का जोखिम ही कम हो।” यही कारण है कि विद्यालयों, कार्यस्थलों, ग्रामीण क्षेत्रों और समुदायों में स्वास्थ्य जागरूकता, पोषण शिक्षा, योग, शारीरिक सक्रियता, नशामुक्ति, मानसिक स्वास्थ्य और समय पर स्वास्थ्य जांच को बढ़ावा देना आवश्यक है।

 

आयुर्वेद दिवस 2026 के प्रमुख फोकस में भी integrative healthcare, evidence/research/innovation तथा community wellbeing और sustainable living को महत्व दिया गया है। “स्वस्थ भविष्य” के लिए आज की पांच सरल प्रतिज्ञाएं

 

1. भोजन: संतुलित और आवश्यकता के अनुरूप भोजन।
2. गतिविधि: रोज अपनी क्षमता के अनुसार नियमित शारीरिक सक्रियता।
3. नींद: पर्याप्त और नियमित रात्रि-नींद।
4. मानसिक स्वास्थ्य: योग, प्राणायाम, ध्यान और तनाव-प्रबंधन।
5. चिकित्सा: बीमारी को नजरअंदाज न करें और आवश्यकता पड़ने पर समय पर चिकित्सकीय जांच एवं उपचार लें।

 

आयुर्वेद दिवस का वास्तविक संदेश : आयुर्वेद को केवल अतीत की विरासत के रूप में सुरक्षित रखना पर्याप्त नहीं है। इसे अनुसंधान, वैज्ञानिक प्रमाण, गुणवत्ता, सुरक्षा और आधुनिक स्वास्थ्य आवश्यकताओं के साथ आगे बढ़ाना होगा। आयुर्वेद की शक्ति उसकी समग्र दृष्टि में है और आधुनिक विज्ञान की शक्ति प्रमाण एवं परीक्षण में। इन दोनों के बीच संवाद और वैज्ञानिक समन्वय ही भविष्य की अधिक व्यापक स्वास्थ्य-व्यवस्था के निर्माण में योगदान दे सकता है।

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